Friday, October 30, 2020

वशिष्ठ की साख

 काल्पनिक ही सही , 

पर कुछ किरदारों को मिलाने से इतिहास बन सकता है ! मिसाल के तौर पर एक चरित्र गढ़ा गया राम जिसका विवाह वशिष्ठ द्वारा संभव हो पाया - विवाह था तो प्रासंगिक तौर पर कुछ शर्ते रही होंगी , बस कहिये शर्तो की शुरुआत - परशुराम का धनुष तोड़ना , फिर मसला आया प्रॉपर्टी का हिस्से बांटे 

चुकी वशिष्ठ बरसो से जंगल में खेती करते आये थे  उन्हें लगा , मामला हम बन  में सुलझा लेंगे !

वशिष्ठ की ये अवधारणा भी काम नहीं आयी वशिष्ठ को रा वन ने दुखी देखा, फिर इस कहानी में एक और किरदार आया रा वण , अब रा वन में रा वण ने राम को दुखी करने का प्रोग्राम स्टार्ट किया  , एक हद तक वो सफल भी हुआ , फिर हवाई जहाज से अयोध्या आगमन हुआ . 


कुछ समय तक सब ठीक चला , अब तो रावण भी नहीं अब क्या करे !

फिर आया एक धोबी - राम को दुखी करने का प्रोग्राम Re स्टार्ट किया !

कहानी में कई मोड़ आये और अंत तो गत्वा  

He GOT TWINS :P

वशिष्ठ ने ये सिखाया की जिस परम्परा का प्रारम्भ उसने किया था वो सही थी - वशिष्ठ भी खुश गांव भी खुश !




Thursday, March 14, 2019

महिला बेसन का चित्र - टॉम मर्फी





                          बेसन हिंदी भाषियों के लिए चर्चा का विषय कम खाने का विषय ज्यादा है !

                          चित्र देख अव्वल तो पहचानना मुश्किल ये महिला / पुरुष


प्रथम बार देखने पर लगा जैसे समुद्र में लहरे उठने का चित्रण है , गौर करने पर जिज्ञासा और जागी !

तो पता चला ये महिला बर्फ की सफ़ेद चादर ओढ़े है !

उत्सुकता और बढ़ी क्योंकि हिंदू रीति के लिहाज से अपरिहार्य कारणों से ये तस्वीर उचित नहीं मानी जाती !


Wednesday, January 16, 2019

बहकी है निगाहे और बिखरे है बाल



अर्ध कुम्भ - @ the door off Sir U



अच्छी खासी सामाजिक व्यवस्था के बीच ६ / १२ वर्षो में चंद नहीं असंख्य नवागंतुकों का आगमन न जाने कहाँ कहाँ से होता है कहना / ढूँढना मुश्किल है 

अर्ध कुम्भ और पूर्ण कुम्भ ये होते क्या और क्यों है ये जानने का प्रयास करने का वक़्त भी नहीं है , रहना हमें सामाजिक दायरों में ही है 

फिर इसी सामाजिक व्यवस्था से कुछ लोग कुम्भ से जुड़ जाते है प्रत्यक्ष जो साधुवाद(नीचे तस्वीर) का हिस्सा बनते है कुछ महज व्यावसायिक उद्देश्य क्योकि परिवार चलाना है, परोक्ष भी जो दोनों से अलग है जिज्ञासा वश  इस तरह के मेलों का हिस्सा होते है 




खाइके पान...  की एवज पी के हुक्का  Sir you wala

Wednesday, July 16, 2014

मेरे दुश्मन मेरे भाई मेरे हमसाये (इजराइल - फिलिस्तीन)

ऐसा क्यों है के पास पड़ोस में रहने वाले देश आपस मैं लड़ते है !

भारत - पाकिस्तान !

ईरान - इराक !

इसराइल - फिलिस्तीन !

शायद हम  लड़ने में  इतने व्यस्त हो जाते है की ये जहमत  भी  नहीं  उठाना चाहते  के  आखिर  हम    लड़  क्यों रहे  है ! हमने इतिहास से कुछ  और सीखा  हो  या  नहीं पर लड़ना तो सीखा ही है !

अब  जब लड़ना सीखा  है तो  वजह हो या  न  हो लड़ना है वरना  हम  वजह  खुद  ही ढूढ़ लेते है !

हमारा देश १९४७ मे आजाद हो गया था तब हम अंग्रेजो से लड़ रहे थे ! आज भी अंग्रेजी बोलने लिखने पढ़ने या आचरण करने वाले को भारतीय समाज मैं सबसे समज़दार समज़्हा जाता है बच्चा अंग्रेजी विद्यालय मैं पढता है तो ये ज्यादा अच्छी बात समज़्ही जाती है और भारत के  किसी  भी  कोने  मैं   रहकर  आप  इसबात  पर  यकीन  करने लगेंगे.

अब  yadi अंग्रेजी  इतनी  ही  भली  लगी  और  अंग्रेजी  का  आचरण  इतना  भला  लगा  तो  फिर  अंग्रेजो  को  जाने  ही  क्यों  दिया !

लेकिन वे एक कार्य अच्छा  कर गए ४०० सालो  मैं उस देश को  जो की सुबो मैं बटा  था एक  कर  गए  !

यहाँ ये बात  बताना भी जरुरी है के  इंग्लैंड  छेत्रफल के दृस्टि से  केरला  या  तमिलनाडु  से  बड़ा   नहीं   होगा  , पर  वो  आये  जबकि ये वो ही समय था जब यूरोप भी गृहयुद्ध लड़ रहा था !

पर उन्होंने किसी और का सहारा नहीं लिया वे लड़े और फिर एक हो गए !

३०० सालो के गृहयुद्ध के बाद उन्होंने सीमाये तो वही रहने दी पर अवरोध हटा दिए ताकि कोई भी यूरोप वासी किसी भी देश मैं रह सकता है अथवा कार्य कर सकता है !

इसके अलावा उन्होंने अमेरिका जो की एक अलग थलग महाद्वीप था अपनी जद मैं ले लिया !

एक यूरोप वासी के लिए अमेरिका जाना जितना आसान है उतना शायद ही हमारे लिए है !

इस्रायल देश का जनम भी लगभग उन्ही दिनों हुआ जब इंडिया का जनम हुआ और मूलतः जैसे
इंडिया - पाकिस्तान लड़ते है , लगभग उसी तरह इसराइल - फिलिस्तीन भी लड़ते है !

किसी भी संस्था से जुड़े लोगो को कार्य पर लगाना है तो आसान कार्य ये ही हो सकता है के दूसरी संस्था से लड़ते रहो !

कुछ लोग इन संस्थाओ को niji धरोहर मानते है और फिर वो जैसा चाहते है वैसा चलते है , इस वजह से अायुध कारखानो मैं कार्य करने वाले श्रमिको को रोजगार मिलता है तो फिर आखिर युद्ध क्यों न हो !

आसान कार्य कोई भी कर सकता है, मुश्किल ये है के हम एक दूसरे को समजे क्योकि जरुरत पड़ने पर सबसे आसान सुविधा हमारा पासपडोस ही होता है ये हम क्यों भूल जाते है !

जरुरत है समज़दारी की लेकिन इतना वक्त भी नहीं होता !

अंतरास्ट्रीय स्तर पर हमेशा ये ही होता है की युद्ध मैं जितने वाले को जितने के बाद हारने वाले के नुकसान की भरपाई करनी होती है !

जर्मन अभी तक यूरोप को सहयोग दे रहा है (प्रथम और द्वितीय युद्ध का)

अमेरिका अभी तक जापान की सहायता कर रहा है (हिरोशिमा - नागासाकी )

आगे शायद ये ही हाल

भारत - पाकिस्तान का हो

इस्रायल - फिलिस्तीन का  भी ऐसा ही हो !

लड़ते रहो क्योकि एक लड़ाई जीतकर कोई सिकंदर नहीं बन सकता  या फिर थोड़ी समज़हदारी से पेश आओ !

Saturday, July 12, 2014

जीवन भर का विद्यार्थी (बुद्धपूर्णिमा)

वर्ष मैं एक बार मौका आता है जब विद्यार्थी अपने अपने शिक्षकों का वंदन  करते  है , ये  क्यों  किया  जाता है शायद ९९% नहीं जानते पर परंपरा है तो उसे हम सभी निभा रहे है , कुछ लोग जानभूज़ कर इस प्रक्रिया का हिस्सा है तो बहुतसे अंजाने मैं ही करते है उनमें से मैं  भी एक हु ! अमेरिका इस पर्व को इस वर्ष "Supermoon" देख कर मना रहा है ! वैसे इंटरनेट पर काफी खोज के बाद भी मैं "Supermoon" के विषय मैं ज्यादा जान नहीं पाया !

सरसरी तौर पर देखने से ये लगता है के हम उन शिक्षको का अभिवादन इस लिए करते है क्योकि हमने उनसे कुछ ज्ञान अर्जित किया है ऋण स्वरुप हम उन प्रबुद्धजनो का आभार मानते है।  पर इस बदले परिवेश और हर पल बदली टुनिया का हिस्सा होने से ये तय कर पाने मैं असमंजस की स्तिथि मैं आ जाते है आखिर किसको गुरु माने!

कही पढ़ा था की हम सभी उम्र भर के लिए विद्यार्थी है , पर पारम्परिक तौर पर हमे इस पर्व को    चलायमान  रखना  है! अतः  उन सभी का धन्यवाद जिनसे मैंने कुछ सीखा है फिर वो मुज़्हसे बड़ा हो या छोटा , अच्छा  हो या  बुरा !
           
बुद्ध पूर्णिमा / गुरु पूर्णिमा के इस पवन पर्व पर सभी  का  आभार  जिनसे  मुज़हे अच्छा या  बुरा  सिखने को मिला है !


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