ऐसा क्यों है के पास पड़ोस में रहने वाले देश आपस मैं लड़ते है !
भारत - पाकिस्तान !
ईरान - इराक !
इसराइल - फिलिस्तीन !
शायद हम लड़ने में इतने व्यस्त हो जाते है की ये जहमत भी नहीं उठाना चाहते के आखिर हम लड़ क्यों रहे है ! हमने इतिहास से कुछ और सीखा हो या नहीं पर लड़ना तो सीखा ही है !
अब जब लड़ना सीखा है तो वजह हो या न हो लड़ना है वरना हम वजह खुद ही ढूढ़ लेते है !
हमारा देश १९४७ मे आजाद हो गया था तब हम अंग्रेजो से लड़ रहे थे ! आज भी अंग्रेजी बोलने लिखने पढ़ने या आचरण करने वाले को भारतीय समाज मैं सबसे समज़दार समज़्हा जाता है बच्चा अंग्रेजी विद्यालय मैं पढता है तो ये ज्यादा अच्छी बात समज़्ही जाती है और भारत के किसी भी कोने मैं रहकर आप इसबात पर यकीन करने लगेंगे.
अब yadi अंग्रेजी इतनी ही भली लगी और अंग्रेजी का आचरण इतना भला लगा तो फिर अंग्रेजो को जाने ही क्यों दिया !
लेकिन वे एक कार्य अच्छा कर गए ४०० सालो मैं उस देश को जो की सुबो मैं बटा था एक कर गए !
यहाँ ये बात बताना भी जरुरी है के इंग्लैंड छेत्रफल के दृस्टि से केरला या तमिलनाडु से बड़ा नहीं होगा , पर वो आये जबकि ये वो ही समय था जब यूरोप भी गृहयुद्ध लड़ रहा था !
पर उन्होंने किसी और का सहारा नहीं लिया वे लड़े और फिर एक हो गए !
३०० सालो के गृहयुद्ध के बाद उन्होंने सीमाये तो वही रहने दी पर अवरोध हटा दिए ताकि कोई भी यूरोप वासी किसी भी देश मैं रह सकता है अथवा कार्य कर सकता है !
इसके अलावा उन्होंने अमेरिका जो की एक अलग थलग महाद्वीप था अपनी जद मैं ले लिया !
एक यूरोप वासी के लिए अमेरिका जाना जितना आसान है उतना शायद ही हमारे लिए है !
इस्रायल देश का जनम भी लगभग उन्ही दिनों हुआ जब इंडिया का जनम हुआ और मूलतः जैसे
इंडिया - पाकिस्तान लड़ते है , लगभग उसी तरह इसराइल - फिलिस्तीन भी लड़ते है !
किसी भी संस्था से जुड़े लोगो को कार्य पर लगाना है तो आसान कार्य ये ही हो सकता है के दूसरी संस्था से लड़ते रहो !
कुछ लोग इन संस्थाओ को niji धरोहर मानते है और फिर वो जैसा चाहते है वैसा चलते है , इस वजह से अायुध कारखानो मैं कार्य करने वाले श्रमिको को रोजगार मिलता है तो फिर आखिर युद्ध क्यों न हो !
आसान कार्य कोई भी कर सकता है, मुश्किल ये है के हम एक दूसरे को समजे क्योकि जरुरत पड़ने पर सबसे आसान सुविधा हमारा पासपडोस ही होता है ये हम क्यों भूल जाते है !
जरुरत है समज़दारी की लेकिन इतना वक्त भी नहीं होता !
अंतरास्ट्रीय स्तर पर हमेशा ये ही होता है की युद्ध मैं जितने वाले को जितने के बाद हारने वाले के नुकसान की भरपाई करनी होती है !
जर्मन अभी तक यूरोप को सहयोग दे रहा है (प्रथम और द्वितीय युद्ध का)
अमेरिका अभी तक जापान की सहायता कर रहा है (हिरोशिमा - नागासाकी )
आगे शायद ये ही हाल
भारत - पाकिस्तान का हो
इस्रायल - फिलिस्तीन का भी ऐसा ही हो !
लड़ते रहो क्योकि एक लड़ाई जीतकर कोई सिकंदर नहीं बन सकता या फिर थोड़ी समज़हदारी से पेश आओ !